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दूसरे विश्व युद्ध का भयावह सच - Digital World Updates

दूसरे विश्व युद्ध का भयावह सच

किसी ने सच ही कहा है  कि यह दुनिया बहुत खूबसूरत है और इसके लिए युद्ध भी जरूरी है।  पूरी दुनिया इसी कथन पर भरोसा करती है। लगभग 70 देशों की थल-जल-वायु सेनाएँ इस युद्ध में सम्मलित थीं। इस युद्ध में विश्व दो भागों मे बँटा हुआ था ।  पहला मित्र राष्ट्र तथा धुरी राष्ट्र ।

दूसरा विश्व युद्ध इस दुनिया का बेहद ही कड़वा तथा भयानक सा  लगने वाला  सच है। 1 सितंबर 1939  को जर्मन तानाशाह एडोल्फ हिटलर ने पोलैंड पर हमला कर दूसरे विश्व युद्ध का एलानकर दिया  था। इसमें उसके साथ इटली, जापान, हंगरी, रोमानिया और बुल्गारिया थे।

वहीं, दूसरी ओर अमेरिका, सोवियत यूनियन, ब्रिटेन, चीन, फ्रांस, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, बेल्जियम, पोलैंड, यूगोस्लाविया, ब्राजील, ग्रीस, नीदरलैंड, न्यूजीलैंड, नार्वे, दक्षिण अफ्रीका, मेक्सिको, चेकोस्लोवाकिया और मंगोलिया की सेना खड़ी थी। तकरीबन 6 साल तक चले इस युद्ध में दोनों ओर से 2 करोड़  40 लाख तो  सिर्फ सैनिक मारे गए। वहीं, लगभग चार करोड़  90  लाख नागरिकों ने जान गंवाई। अमेरिका और सहयोगी देशों से छह करोड़ दस लाख और जर्मनी खेमे से एक करोड़ बीस लाख लोग मारे गए।  इस युद्ध में विभिन्न राष्ट्रों के लगभग 10 करोड़ सैनिकों ने हिस्सा लिया, तथा यह मानव इतिहास का सबसे ज़्यादा घातक युद्ध साबित हुआ था । इस महायुद्ध में 5 से 7 करोड़ व्यक्तियों की जानें गईं थी ।

वैसे तो इस महायुद्ध का अंत मई  1945 में हुआ, लेकिन एशिया में इस विश्व युद्ध का अंत सितंबर में माना जाता है। अमेरिका ने 6 और 9 अगस्‍त  1945  को जापान के दो शहरों हिरोशिमा और नागासाकी पर परमाणु बम गिराए। 15 अगस्‍त 1945  को जापान के शासक हिरोहितो ने रेडियो के जरिए देश के नाम संबोधन जारी किया, जिसमें उन्होंने जापान के सरेंडर का एलान किया। इसके बाद 2 सितंबर 1945 को जापान ने अमेरिका के सामने आत्‍म समर्पण कर दिया।

द्वितीय विश्वयुद्ध में, सोवियत की  लाल सेना दुनिया के प्रथम समाजवादी समाज की रक्षा मे एक न्यायोचित, नाजी-विरोधी युद्ध लड़ रही थी, जबकि अमेरिकी सेनाएं यह सुरक्षित कर लेने के लिए लड़ रही थीं कि युद्धोत्तर विश्व में मचने वाली नोच-खसोट में अमेरिकी पूँजीवाद सबसे फ़ायदे की स्थिति में रहे। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद, अमेरिका तुरन्त ही यूनान, कोरिया, वियतनाम, फ़िलीपिन्स और कई दूसरे देशों में चल रहे क्रांतिकारी आन्दोलनों के विरुद्ध युद्धों में कूद पड़ा-जबकि जर्मनी के अधिग्रहीत कर लिए गये अमेरिका-प्रशासित भागों में अमेरिकी सत्ताधारी पूर्व नाजी सत्ता को फ़िर से बहाल करने में लग गये। इसके विपरीत समाजवादी सोवियत संघ हमारी सदी की दूसरी महान क्रान्ति-माओ त्से तुङ के नेतृत्व वाली 1949 की चीनी क्रांति  के लिए एक महत्वपूर्ण पृष्ठभूमि बना गया था ।

हिटलर की सेनाएँ मूलतः पूर्वी मोर्चे पर.सोवियत संघ के मैदानी भागों और घिरे शहरों में-ही पराजित कर दी गयी थी। डी-डे आक्रमण तो स्तालिनग्राद में नाजी आक्रमण के उच्च ज्वार के ध्वस्त कर दिये जाने के डेढ़ साल बाद ही शुरू किया गया। इस तथाकथित डी-डे की जर्मन कमान की 259 डिवीजनों और ब्रिगेडें तो पूर्वी मोर्चे पर सोवियत लाल सेना का सामना कर रही थीं। हिटलर ने उन डिवीजनों में से मात्र 60 डिवीजनों को नये पश्चिमी मोर्चे पर एंग्लो-अमेरिकी सेनाओं से निपटने के लिए भेजा था। आइज़नहावर के डी-डे आक्रमण का मुकाबला करने वाली जर्मन फ़ौज में मुख्यतः अधेड़ वय के सैनिक, किशोर वय के लड़के एवं बलात पकड़कर भेज दिये गये पूर्वी यूरोपियन ही थे। यह तो लाल सेना ही थी जिसने जर्मन सेनाओं के बहुलांश को तहस-नहस किया, और बर्लिन पर कब्जा किया।

नॉरमैंडी में अमेरिका के उतरने का   मुख्य कारण पूरे पूर्वी यूरोप में पूँजीवाद के विरुद्ध एक क्रान्ति की मुहिम छेड़ देने के लिए आगे बढ़ रही लाल सेना को रोकना था। जर्मनी और सोवियत संघ के बीच चले पूरे युद्ध के दौरान, अमेरिका और ब्रिटेन, पश्चिमी यूरोप में, एक दूसरा मोर्चा खोलने से इंकार ही करते रहे थे। जब उन्हें यह मालूम पड़ने लगा कि अब तो सोवियत संघ अकेले ही जर्मनी को हरा देगा, तब उन्होंने डी-डे आक्रमण के साथ दूसरा मोर्चा खोला। एक प्रतिक्रियावादी पत्रिका ने कुछ समय पहले लिखा था: ‘‘पश्चिमी मित्र राष्ट्रों के सफ़ल नॉरमैंडी आक्रमण के बिना तो सिर्फ़ बर्लिन और वियना ही नहीं बल्कि पेरिस पर भी लाल झण्डा कभी का लहरा चुका होता।

इसी विनाश लीला को देखते हुवे हम कह सकते हैं की युध्य से  किसी समस्या का हल  नहीं हो सकता । ये 1939 की बात है तब दुनिया बहुत पीछे थी अब  यदि भविष्य में दुनिया अगर तीसरा विश्व युध्य देखती है तो विनाश भी सेकड़ो गुना अधिक होगा ।

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