मानसून का जोरदार आगमन

हर किसी को  मानसून की दरक़ार थी  तो लीजिये प्रदेश में पुनः मानसून ने अपना डेरा डाला बुधवार शाम से  मानसून का  जोरदार  आगमन  हुआ । देश की कृषि काफी हद तक मॉनसून पर निर्भर है क्योंकि सिर्फ 40 फीसदी कृषि योग्य भूमि सिंचाई के तहत है।

हिमालय पर्वत से नीचे खिसकने के बाद मानसून मध्य  प्रदेश की तरफ बढ़ा और बारिश शुरू हुई। हालांकि अभी भी तेज बारिश की बहुत  दरकार है। लेकिन मौसम विभाग ने सूचना दी है कि एक-दो दिन में तेज बारिश हो सकती है। इसका कारण बताते हुए मौसम विभाग कर्मचारियों ने बताया कि बंगाल की खाड़ी से एक मानसूनी चक्रवात सक्रिय होकर प्रदेश की तरफ बढ़ा है। इसी चक्रवात के पीछे दो-तीन सिस्टम और सक्रिय होकर प्रदेश की तरफ बढ़ रहे हैं। इससे मानसून के मजबूत होकर तेज बारिश की संभावना है। इधर बुधवार शाम पांच बजे से बारिश हुई। इसके पहले दिन में बूंदा-बांदी हो रही थी।

मौसम विभाग की ओर से एक अच्छी खबर आ रही है। मौसम केन्द्र निदेशक जे पी गुप्ता ने बताया कि बंगाल की खाड़ी में कम दबाव का क्षेत्र बन रहा है और पश्चिमी विक्षोभ भी सक्रिय हो चला है  । मानसून जून में शुरू होता है और सितंबर तक सक्रिय रहता है। दीर्घावधि पूर्वानुमान के दौरान मौसम विभाग कई पैमानों का इस्तेमाल कर इन चार महीनों के दौरान होने वाली मानसूनी बारिश की मात्रा को लेकर संभावना जारी करता है। पूर्व अनुमान से कृषि एवं अन्य क्षेत्रों को अपनी जरूरी तैयारियां करने में मदद मिलती है। पिछले साल मौसम विज्ञान विभाग ने मानसून के106 प्रतिशत बारिश का भविष्यवाणी लेकिन वास्तविक बारिश 97 प्रतिशत हुई थी।

हमारे देश में गर्मी की शुरुआत होते ही किसान मानसून पर टकटकी लगाकर बैठ जाते हैं। लेकिन मानसून एक ऐसी अबूझ पहेली है जिसका अनुमान लगाना बेहद जटिल है। कारण यह है कि भारत में विभिन्न किस्म के जलवायु जोन और उप जोन हैं। हमारे देश में 127 कृषि जलवायु उप संभाग हैं और 36 संभाग हैं। हमारा देश विविध जलवायु वाला है। समुद्र, हिमालय और रेगिस्तान मानसून को प्रभावित करते हैं। इसलिए मौसम विभाग के तमाम प्रयासों के बावजूद मौसम के मिजाज को सौ फीसदी भांपना अभी भी मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है ।

भारतीय मौसम विज्ञान विभाग अमौसी लखनऊ के निदेशक जेपी गुप्ता ने बताया  ग्रीष्म ऋतु में जब हिन्द महासागर में सूर्य विषुवत रेखा के ठीक ऊपर होता है तो मानसून बनता है। उन्होंने कहा कि इस प्रक्रिया में समुद्र गरमाने लगता है और उसका तापमान 30 डिग्री तक पहुंच जाता है। वहीं उस दौरान धरती का तापमान 45-46 डिग्री तक पहुंच चुका होता है। ऐसी स्थिति में हिन्द महासागर के दक्षिणी हिस्से में मानसूनी हवाएं सक्रिय होती हैं।

ये हवाएं आपस एक दूसरे  में क्रॉस करते हुए विषुवत रेखा पार कर एशिया की तरफ बढ़ने लगती हैं। इसी दौरान समुद्र के ऊपर बादलों के बनने की प्रक्रिया शुरू होती है। विषुवत रेखा पार करके हवाएं और बादल बारिश करते हुए बंगाल की खाड़ी और अरब सागर का रुख करते हैं। इस दौरान देश के तमाम हिस्सों का तापमान समुद्र तल के तापमान से अधिक हो जाता है। ऐसी स्थिति में हवाएं समुद्र से जमीन की ओर बहनी शुरू हो जाती हैं। ये हवाएं समुद्र के जल के वाष्पन से उत्पन्न जल वाष्प को सोख लेती हैं और पृथ्वी पर आते ही ऊपर उठती हैं और वर्षा देती हैं।

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