योग से मिटायें रोग

माना जाता है कि योग (Yoga) का जन्म भारत में ही हुआ मगर दुखद यह रहा की आधुनिक कहे वाले समय में अपनी दौड़ती-भागती ज़िन्दगी से लोगों ने योग को अपनी दिनचर्या से हटा लिया। जिसका असर लोगों के स्वाथ्य पर हुआ। मगर आज भारत में ही नहीं विश्व भर में योग का बोलबाला है और निसंदेह उसका श्रेय भारत के ही योग गुरूओं को जाता है जिन्होंने योग (Yoga) को फिर से पुनर्जीवित किया।

सभी तनाव सम्बंधी बीमारियों में इसके फायदे सिद्ध हो चुके हैं। इसमें उच्च रक्तचाप, ऑटो इम्यून डिसऑर्डर, अवसाद, घबराहट और बर्नआउट जैसी कार्डियोवैस्कुलर सिस्टम की परेशानियाँ भी शामिल हैं। पीठ और गर्दन के दर्द से लेकर विचलित करने वाले बोवेल सिंड्रोम में भी इससे फायदा होता है। योग (Yoga) से केवल लक्षण ही नहीं, मूल बीमारी भी ठीक हो जाती है। यद्यपि योग की उत्पत्ति हमारे देश में हुई है, किंतु आधुनिक समय में इसका प्रचार-प्रसार विदेशियों ने किया है, इसलिए पाश्चात्य सभ्यता की नकल करने वाले ‘योग‘ (Yoga) शब्द को ‘योगा’ बोलने में गौरवान्वित महसूस करते हैं।

प्राचीन समय में इस विद्या के प्रति भारतीयों ने सौतेला व्यवहार किया है। योगियों का महत्त्व कम नहीं हो जाए. अत: यह विद्या हर किसी को दी जाना वर्जित थी। योग (Yoga) ऐसी विद्या है जिसे रोगी-निरोगी, बच्चे-बूढ़े सभी कर सकते हैं। महिलाओं के लिए योग बहुत ही लाभप्रद है। चेहरे पर लावण्य बनाए रखने के लिए बहुत से आसन और कर्म हैं। कुंजल, सूत्रनेति, जलनेति, दुग्धनेति, वस्त्र धौति कर्म बहुत लाभप्रद हैं। कपोल शक्ति विकासक, सर्वांग पुष्टि, सर्वांग आसन, शीर्षासन आदि चेहरे पर चमक और कांति प्रदान करते हैं।

योग (Yoga) का सबसे खास पक्ष है सांस और गति के बीच तालमेल स्थापित होना, जिससे शांति और विश्राम की स्थित में पहुंचा जाता है। तनाव की स्थिति में हमारा सिंपेथेटिक नर्वस सिस्टम सक्रिय रहता है। तनाव और उसके साथ आने वाली थकावट की अनुभूतियों का असर कम करने के लिए हमें तनाव के चक्र को नियमित रूप से तोड़ने की ज़रूरत होती है। योगाभ्यास कर शांति और विश्राम की स्थिति में आने से हमें खुद के बारे में अच्छी अनुभूति होती है। यह विचार कि हम खुद पर नियंत्रण के लिए कुछ कर सकते हैं, तनाव के असर को कम करता है और इस तरह तनाव की अनुभूति कम तनावपूर्ण लगने लगती है।

मोटापे को दूर करने के लिए  वैसे तो मात्र आंजनेय आसन ही लाभयायक सिद्ध होगा लेकिन आप करना चाहे तो ये भी कर सकते हैं- वज्रासन, मण्डूकासन, उत्तानमण्डूसकासन, उत्तानकूर्मासन, उष्ट्रासन, चक्रासन, उत्तानपादासन, सर्वागांसन व धनुरासन, भुजंगासन, पवनमुक्तासन, कटिचक्रासन, कोणासन, उर्ध्वाहस्तोहत्तातनासन और पद्मासन।

श्वास क्रिया सीधे खड़े होकर दोनों हाथों की उँगलियाँ आपस में फँसाकर ठोढ़ी के नीचे रख लीजिए. दोनों कुहनियाँ यथासंभव परस्पर स्पर्श कर रही हों। अब मुँह बंद करके मन ही मन पाँच तक की गिनती गिनने तक नाक से धीरे-धीरे साँस लीजिए. इस बीच कंठ के नीचे हवा का प्रवाह अनुभव करते हुए कुहनियों को भी ऊपर उठाइए. ठोढ़ी से हाथों पर दबाव बनाए रखते हुए साँस खींचते जाएँ और कुहनियों को जितना ऊपर उठा सकें उठा लें। इसी बिंदु पर अपना सिर पीछे झुका दीजिए. धीरे से मुँह खोलें। आपकी कुहनियाँ भी अब एकदम पास आ जाना चाहिए. अब यहाँ पर छ: तक की गिनती गिनकर साँस बाहर निकालिए. अब सिर आगे ले आइए. यह अभ्यास दस बार करें, थोड़ी देर विश्राम के बाद यह प्रक्रिया पुन: दोहराएँ। इससे फेफड़े की कार्यक्षमता बढ़ती है। तनाव से मुक्ति मिलती है और आप सक्रियता से कार्य में संलग्न हो सकती हैं।

सूर्य नमस्कार (Surya Namaskar)

सूर्य नमस्कार योगासनों में सर्वश्रेष्ठ प्रक्रिया है। यह अकेला अभ्यास ही साधक को सम्पूर्ण योग व्यायाम का लाभ पहुंचाने में समर्थ है। मानव शरीर की सरंचना ब्रम्हांड की पंच तत्वों से हुआ है और इसे (शरीर रूपी यंत्र) सुचारू रूप से गतिमान स्नायु तंत्र करता है। जिस व्यक्ति के शरीर में स्नायुविक तंत्र जरा-सा भी असंतुलित होता है वह गंभीर बीमारी की ओर अग्रसर हो जाता है। “सूर्य नमस्कार(Surya Namaskar) स्नायु ग्रंथि को उनके प्राकृतिक रूप में रख संतुलित रखता है। इसके अभ्यास से साधक का शरीर नीरोग और स्वस्थ होकर तेजस्वी हो जाता है। ‘सूर्य नमस्कार’ स्त्री, पुरुष, बाल, युवा तथा वृद्धों के लिए भी उपयोगी बताया गया है।

पादहस्त आसन

सीधे खड़ा होकर अपने नितंब और पेट को कड़ा कीजिए और पसलियों को ऊपर खीचें। अपनी भुजाओं को धीरे से सिर के ऊपर तक ले जाइए. अब हाथ के दोनों अँगूठों को आपस में बाँध लीजिए. साँस लीजिए और शरीर के ऊपरी हिस्से को दाहिनी ओर झुकाइए. सामान्य ढंग से साँस लेते हुए दस तक गिनती गिनें फिर सीधे हो जाएँ और बाएँ मुड़कर यही क्रिया दस गिनने तक दोहराएँ। पुन: सीधे खड़े होकर जोर से साँस खींचें। इसके पश्चात कूल्हे के ऊपर से अपने शरीर को सीधे सामने की ओर ले जाइए. फर्श और छाती समानांतर हों। ऐसा करते समय सामान्य तरीके से साँस लेते रहें। अपने धड़ को सीधी रेखा में रखते हुए नीचे ले आइए

बिना घुटने मोड़े फर्श को छूने की कोशिश करें। यथासंभव सिर को पाँवों से छूने का प्रयास करें। दस तक गिनती होने तक इसी मुद्रा में रहें। अपनी पकड़ ढीली कर सामान्य अवस्था में आ जाएँ। इस आसन से पीठ, पेट और कंधे की पेशियाँ मजबूत होती हैं और रक्त संचार ठीक रहता है।

शवासन

इस आसन में आपको कुछ नहीं करना है। आप एकदम सहज और शांत हो जाएँ तो मन और शरीर को आराम मिलेगा। दबाव और थकान खत्म हो जाएगी। साँस और नाड़ी की गति सामान्य हो जाएगी। इसे करने के लिए पीठ के बल लेट जाइए. पैरों को ढीला छोड़कर भुजाओं को शरीर से सटाकर बगल में रख लें। शरीर को फर्श पर पूर्णतया स्थिर हो जाने दें।

कपालभाति क्रिया

अपनी एड़ी पर बैठकर पेट को ढीला छोड़ दें। तेजी से साँस बाहर निकालें और पेट को भीतर की ओर खींचें। साँस को बाहर निकालने और पेट को धौंकनी की तरह पिचकाने के बीच सामंजस्य रखें। प्रारंभ में दस बार यह क्रिया करें, धीरे-धीरे 60 तक बढ़ा दें। बीच-बीच में विश्राम ले सकते हैं। इस क्रिया से फेफड़े के निचले हिस्से की प्रयुक्त हवा एवं कार्बन डाइ ऑक्साइड बाहर निकल जाती है और सायनस साफ हो जाती है साथ ही पेट पर जमी फालतू चर्बी खत्म हो जाती है। इस प्राणायाम को करने के बाद अनुलोम विलोम प्राणायाम भी करे, कपाल भाती और अनुलोम विलोम प्राणायाम दोनो मित्र प्राणायाम है।

पद्मासन

विधि: जमीन पर बैठकर बाएँ पैर की एड़ी को दाईं जंघा पर इस प्रकार रखते हैं कि एड़ी नाभि के पास आ जाएँ। इसके बाद दाएँ पाँव को उठाकर बाईं जंघा पर इस प्रकार रखें कि दोनों एड़ियाँ नाभि के पास आपस में मिल जाएँ।

मेरुदण्ड सहित कमर से ऊपरी भाग को पूर्णतया सीधा रखें। ध्यान रहे कि दोनों घुटने जमीन से उठने न पाएँ। तत्पश्चात दोनों हाथों की हथेलियों को गोद में रखते हुए स्थिर रहें। इसको पुनः पाँव बदलकर भी करना चाहिए. फिर दृष्टि को नासाग्रभाग पर स्थिर करके शांत बैठ जाएँ।

विशेष

स्मरण रहे कि ध्यान, समाधि आदि में बैठने वाले आसनों में मेरुदण्ड, कटिभाग और सिर को सीधा रखा जाता है और स्थिरतापूर्वक बैठना होता है। ध्यान समाधि के काल में नेत्र बंद कर लेना चाहिए. आँखे दीर्घ काल तक खुली रहने से आँखों की तरलता नष्ट होकर उनमें विकार पैदा हो जाने की संभावना रहती है।

लाभ

यह आसन पाँवों की वातादि अनेक व्याधियों को दूर करता है। विशेष कर कटिभाग तथा टाँगों की संधि एवं तत्सम्बंधित नस-नाड़ियों को लचक, दृढ़ और स्फूर्तियुक्त बनाता है। श्वसन क्रिया को सम रखता है। इन्द्रिय और मन को शांत एवं एकाग्र करता है। इससे बुद्धि बढ़ती एवं सात्विक होती है। चित्त में स्थिरता आती है। स्मरण शक्ति एवं विचार शक्ति बढ़ती है। वीर्य वृद्धि होती है। सन्धिवात ठीक होता है।

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