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क्रांतिकारी खुदीराम बोस

written by Atul Mahajan August 12, 2017

हर वर्ष भारत में 15 अगस्त को स्वन्त्रता दिवस के रूप में मनाया जाता है। भारत के लोगों के लिए ये दिन बहुत महत्त्वपूर्ण होता है। वर्षों की गुलामी के बाद ब्रिटिश शासन से इसी दिन अपने देश को आजादी मिली थी। 15 अग्स्त 1947 को ब्रिटिश साम्राज्य से देश की स्वतंत्रता को सम्मान देने के लिए पूरे भारत में राष्ट्रीय और राजपत्रित अवकाश के रूप में इस दिन को घोषित किया गया है। हालांकि अंग्रेजों से आजादी पाना भारत के लिए आसान कार्य नहीं था। इस पल को जीवंत बनाने के लिए हमारे देश के हजारों नौजवानों ने अपनी जान कुर्बान कर डाली थी। इन्हीं बहादुर सपूतों में से एक था वीर खुदीराम बोस। खुदीराम देश की आजादी की लड़ाई में शहीद होने वाला पहला और सबसे कम उम्र का क्रांतिकारी था। खुदीराम बोस महज 18 साल की उम्र में ही देश के लिए हंसते-हंसते सूली पर चढ़ गए थे।

 

भारतीय स्वाधीनता संग्राम में अपनी आहुति देने वाले प्रथम सेनानी खुदीराम बोस माने जाते हैं। उनकी शहादत ने हिंदुस्तानियों में आजादी की जो ललक पैदा की उससे स्वाधीनता आंदोलन को नया बल मिला था। खुदीराम बोस का जन्म बंगाल में मिदनापुर जिले के हबीबपुर गांव में हुआ था। 3 दिसम्बर 1889 को जन्मे बोस जब बहुत छोटे थे तभी उनके माता-पिता का निधन हो गया था। उनकी बड़ी बहन ने ही उनको पाला था। बंगाल विभाजन (1905) के बाद ही खुदीराम बोस स्वतंत्रता संग्राम आंदोलन में कूद पड़े थे। सत्येन बोस के नेतृत्व में खुदीराम बोस ने अपना क्रांतिकारी जीवन शुरू किया था।

 

आपको यह जानकर आश्चर्य होगा की वह अपने स्कूली दिनों से ही राजनीतिक गतिविधियों में शामिल होने लगे थे। वे जलसे-जलूसों में शामिल होकर ब्रिटिश साम्राज्यवाद के खिलाफ नारे लगाते थे। नौवीं कक्षा के बाद ही उन्होंने पढ़ाई छोड़ दी और सिर पर कफन बांधकर जंग-ए-आजादी में कूद पड़े। बाद में वह रेवलूशन पार्टी के सदस्य बने।

बोस, वंदेमातरम के पर्चे बांटते थे। पुलिस ने 28 फरवरी, सन 1906 को सोनार बंगला नामक एक इश्तहार बांटते हुए बोस को दबोच लिया। लेकिन बोस पुलिस के शिकंजे से भागने में सफल रहे। 16 मई, सन 1906 को एक बार फिर पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया, लेकिन उनकी आयु कम होने के कारण उन्हें चेतावनी देकर छोड़ दिया गया था। 6 दिसम्बर, 1907 को बंगाल के नारायणगढ़ रेलवे स्टेशन पर किए गए बम विस्फोट की घटना में भी बोस भी शामिल थे।

कलकत्ता में उन दिनों किंग्सफोर्ड चीफ प्रेंसीडेसी मजिस्ट्रेट था। वह बहुत सख़्त और क्रूर अधिकारी था। वह अधिकारी देश भक्तों, विशेषकर क्रांतिकारियों को बहुत ज़्यादा तंग करता था।

उन पर वह कई तरह के अत्याचार करता था। क्रान्तिकारियों ने उसे मार डालने की ठान ली थी। युगान्तर क्रांतिकारी दल के नेता वीरेन्द्र कुमार घोष ने घोषणा की कि किंग्सफोर्ड को मुज्फ्फरपुर में ही मारा जाएगा। इस काम के लिए खुदीराम बोस तथा प्रपुल्ल चाकी को चुना गया।

ये दोनों क्रांतिकारी बहुत ही अधिक सूझबूझ वाले थे। इस दायित्व को पा कर इनकी खुशी का कोई ठिकाना नहीं था। देश भक्तों को तंग करने वालों को मार डालने का काम उन्हें सौंपा गया था। एक दिन वे दोनों मुजफ्फरपुर पहुंच गए. वहीं एक धर्मशाला में वे आठ दिन रहे। इस दौरान उन्होंने किंग्सफोर्ड की दिनचर्या तथा गतिविधियों पर पूरी नजर रखी। उनके बंगले के पास ही क्लब था। अंग्रेज़ी अधिकारी और उनके परिवार अक्सर सायंकाल वहाँ जाते थे।

30 अप्रैल, 1908 की शाम किंग्स फोर्ड और उसकी पत्नी क्लब में पहुंचे। रात्रि के साढ़े आठ बजे मिसेज कैनेडी और उसकी बेटी अपनी बग्घी में बैठकर क्लब से घर की तरफ आ रहे थे। उनकी बग्घी का रंग लाल था और वह बिल्कुल किंग्सफोर्ड की बग्घी से मिलती-जुलती थी। किंग्सफोर्ड को उड़ाने के चक्क्र में उन्होंने इनकी बग्घी को बम से  उड़ा दिया। क्रांतिकारियों ने समझा की उन्होंने किंग्सफोर्ड को मार गिराया।

अपने को पुलिस से घिरा देख उनके साथी प्रफुल्ल चंद ने खुद को गोली मारकर शहादत दे दी पर खुदीराम बोस पकड़े गए. उनके मन में बिलकुल भी डर की भावना नहीं थी। खुदीराम बोस को जेल में डाल दिया गया और उन पर हत्या का मुकदमा चला। आजादी के बाद हम अपने देश के गद्दारो तथा आतकवादियों को वर्षो तक अरबो रूपये खर्च करके पालते रहते हैं। किन्तु जिन अंग्रेजो के कानून का हम आज तक अनुसरण करते आ रहे हैं उन्होंने मात्र पांच दिन की सुनवाई में इस देश भक्त को सजा सुना दी थी।

 

मुकदमा केवल पांच दिन चला। 8 जून, 1908 को उन्हें अदालत में पेश किया गया और 13 जून को उन्हें प्राण दण्ड की सजा सुनाई गई. यह बात न्याय के इतिहास में एक मजाक बनी रहेगी कि इतना संगीन मुदमा और केवल पांच दिन में समाप्त हो गया। 11 अगस्त, 1908 को इस वीर क्रांतिकारी को फांसी पर चढा़ दिया गया। इस वीर ने हंसते-हंसते वंदेमातरम् के उद्घोष के साथ अपने प्राणों को भारत माता के कदमों पर न्‍योछावर कर दिया।

 

भारत माता के इस सपूत को हम नमन करते है , यह वीर युगो तक याद किया जायेगा

जय हिन्द  जय भारत  जय हिन्द  जय भारत  जय हिन्द  जय भारत   जय हिन्द  जय भारत

 

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