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Automation यानी मशीनों द्वारा इंसानों की जगह काम करने की आधुनिक तकनीक। मोदी सरकार अपने तीन साल पूरे होने का जश्न मना रही है। मंत्री-प्रधानमंत्री तीन साल की उपलब्धियों और कामयाबियों का बखान कर रहे हैं। तरक़्क़ी के तमाम पैमानों पर खरे उतरने के दावे भी कर रहे हैं।सरकार के इन दावों में सबसे कमज़ोर है, लोगों को रोज़गार देने का दावा। पिछले तीन सालों में भारतीय अर्थव्यवस्था की रफ़्तार भले ही तेज़ हुई हो, किन्तु रोज़गार के अवसर लगातार कम हो रहे हैं।

भारत की सनशाइन इंडस्ट्री कहे जाने वाले आईटी सेक्टर के बुरे हाल की वजह पश्चिमी देशों की राष्ट्रवादी नीतियां ही नहीं हैं इस सेक्टर में तेज़ी से हो रहे Automation की वजह से भी रोज़गार के अवसर कम हो रहे हैं। कंपनियां बड़ी तेज़ी से ऐसे सॉफ्टवेयर डेवलप कर रही हैं जिनके ज़रिए काम को बिना इंसान के निपटाया जा रहा है।। भारत की आईटी इंडस्ट्री की कामयाबी की बड़ी वजह ये भी थी कि यहाँ सस्ता श्रम उपलब्ध था। मगर अब ये ऑटोमेशन इस सस्ते श्रम पर भी भारी पड़ रहा है।

कुछ माह पूर्व कॉग्निज़ांट के सीएफओ ने कहा कि उनकी कंपनी बड़े पैमाने पर Automation करेगी, ताकि वह दूसरी कंपनियों से मुक़ाबले में जीत सके | इसी तरह भारत की तीसरी बड़ी आईटी कंपनी इन्फोसिस ने बताया कि Automation की वजह से वह 9 हज़ार कर्मचारियों को निचले स्तर के काम से प्रमोट कर सकी है। इसी तरह विप्रो ने 2016 में Automation की मदद से 3200 कर्मचारियों को नया काम करने का मौक़ा दिया। इस साल विप्रो क़रीब 4500 कर्मचारियों को ऑटोमेशन की वजह से तरक़्क़ी दे सकेगी।

भारत की आईटी कंपनियां ज़्यादातर अमरीकी और दूसरे पश्चिमी देशों के लिए आउटसोर्सिंग का काम करती रही हैं। लेकिन अब जबकि अमरीका और दूसरे बाज़ार संरक्षणवाद और स्थानीय लोगों को नौकरी देने की नीति पर अमल कर रहे हैं। नतीजा ये कि कॉग्निज़ेंट जैसी कंपनियों का अब मुनाफ़ा घट रहा है।

शायद Automation यानी मशीनों के इंसानों की जगह काम करने की वजह से आईटी सेक्टर में कम नौकरियों की जगह बन पा रही है। आनेवाले समय में ऑटोमेशन की वजह से अगले तीन साल में भारत के आईटी सेक्टर में नौकरियों में 20-25 फ़ीसद की कमी आने की आशंका जताई जा रही है।

इनमें से ज़्यादातर वह काम हैं, जिन्हें मशीनें आसानी से और इंसानों के मुकाबले ज़्यादा तेज़ी से कर सकती हैं जैसे कि सॉफ्टवेयर टेस्टिंग। जिस काम को चार कर्मचारी मिलकर करते हैं, उसे एक ही मशीन निपटा देती है, वो भी ज़्यादा तेज़ी से। यानी कोई कंपनी एक ऑटोमैटिक मशीन या टूल खरीदती है तो उसके ४ टेस्टर फालतू हो जायेंगे। आईटी इंडस्ट्री में काम करने वालों को इसका एहसास है इसीलिए वह नया कौशल सीखते हैं। मगर तकनीक इतनी तेज़ी से तरक़्क़ी कर रही है कि हर दो-तीन साल में उनके काम को करने वाली मशीन या सॉफ्टवेयर आ जाते हैं। फिर उन्हें कोई नई स्किल सीखनी पड़ती है।

भारत की अर्थव्यवस्था में आईटी इंडस्ट्री की हिस्सेदारी 9.3 फ़ीसद है। लेकिन इसमें कुल क़रीब 37 लाख कर्मचारी ही काम करते हैं। ऐसे में आईटी सेक्टर की मंदी से देश की अर्थव्यवस्था पर भारी ख़तरा मंडरा रहा है कहना ठीक नहीं होगा। विश्व बैंक के आंकड़े कहते हैं कि भारत की आईटी इंडस्ट्री में 69 फ़ीसद नौकरियों पर ऑटोमेशन का ख़तरा मंडरा रहा है। भारत के मुक़ाबले चीन में 77 प्रतिशत नौकरियाँ ऑटोमेशन की वजह से ख़तरे में हैं। दूसरे विकासशील देशों का भी यही हाल है।

इसके बावजूद ये कहना ग़लत है कि रोबोट, भारत के आईटी सेक्टर की सारी नौकरियाँ खा जाएंगे लेकिन ये बात ज़रूर है कि नई-नई तकनीक की वजह से नौकरियों में लगातार कमी आ रही है। पिछले साल सितंबर में ही कपड़ा कंपनी रेमंड्स ने कहा कि वह अगले तीन साल में दस हज़ार नौकरियाँ  घटाकर ये काम रोबोट से कराएगा।

कंपनियों के लिए ऑटोमेशन करना एक मजबूरी भी है। उन्हें दूसरी कंपनियों से मुक़ाबले में आगे रहना है। अपना मुनाफ़ा बनाए रखना है और दुनिया की बड़ी कंपनियों से होड़ लगानी है। मशीनों से काम करना से आपको सस्ते आयात से मुक़ाबला करने में सहूलत होती है। आपका निर्यात बढ़ता है घरेलू मांग बढ़ती है।

September 11, 2017 0 comment
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